Wednesday, 16 October 2013

होली आई रे



नीला   रंग अम्बर पे धरा हरियाली छायी है 
फीकी पड़ी वसंत बयार लगे होली आयी है 
चहके कानन फूला उपवन चली पवन मतवाली है 
पुलकित तन  बहके मन आनन् पे  छायी लाली  है 
फीकी पड़ी वसंत बयार .........
अमराई फूली सरसों फूली डार डार कोयलिया कूकी 
चातक पपीहा विरही प्रियतमा पिया मिलन हिय हूकी 
फीकी पड़ी वसंत बयार .........
पिया मिलन की आस लगाये निश दिन  स्वप्न सजाये 
जबसे चली मस्त  फगुआ बयार प्रियतम की याद सताए 
फीकी पड़ी वसंत बयार .........
आई गयी प्रिय,  कितनी ऋतू बीतीं  करती रही इंतजार 
दर्पण धूमिल , नैना अश्रु पूरित तुम  बिन अधूरा श्रृंगार 
फीकी पड़ी वसंत बयार .........
आस जगी  तन मन  प्यास  जगी  नयन   तके  हैं   द्वार 
 आना  अबकी  तो  फिर न  जाना  किये  हूँ  सोरह  श्रंगार  
 फीकी पड़ी वसंत बयार .........
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 

भारत और हम



भारत सदैव 
आजाद था
आजाद है 
आजाद रहेगा 
 गुलामी और आजादी
 का कैसे भान हो 
शासक कोई, शासन कोई 
चाहें जो सरकार हो 
जब मानसिकता विकलांग हो 
भारत कभी जकड़ा नहीं 
गुलामी की जंजीर में 
देखने का दोष जो 
सदा रहा तक़दीर में 
लाख लिखने वालों ने
लिखा हो तहरीर में 
भारत था आजाद 
आज भी आजाद है

दुर्दशा का कारण स्वयं 
दोष देते आन का 
चाहिए कन्धा सदैव 
ध्यान नहीं मान का 
 
एक   दूसरे से नाराज हैं 
करते स्वयं कुछ भी नहीं 
सोचते विचारते हैं बहुत 
गलत सही का भान नहीं 
 
बदलती सत्ता पे चाहें 
जश्न  जितना  मना  लो
बदलोगे नहीं आप को 
तो कुछ नहीं पाओगे 
जैसे रहे तुम सदा  
वैसे ही रह जाओगे  
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 

प्रथम पुष्प



प्रथम पुष्प अर्पित तुमको, मसलो या श्रृंगार करो,

आया तेरे द्वार प्रभु, मेरा बेड़ा पार करो ,

चाहत थी जीवन की मेरी, दुखियों का दर्द उधार लूं
उजड़ चुके है जिनके घर, उनको एक नव संसार दूं

दामिन दमकी जला आशियाँ, ऐसी मची तबाही,
रही अधूरी मेरी तमन्ना, ऐसी आंधी है आई,

छाया तम है जीवन में, आशा की किरण कोई नहीं,
सर्वस्व समर्पित चरनन मां, जीवन में कुछ शेष नहीं,

श्रद्धा सुमन अर्पित तुमको, मन उपवन क्यूँ खाली,
हरा भरा रखना डाली को, इस जीवन का तू माली |

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा